Friday, April 6, 2012

इस खतरनाक दौर में
मुन्नी बदनाम हुई
डार्लिंग तेरे लिये
मैं ज़ंदु बाम हुई
डार्लिंग तेरे लिए
मुझे पता है
आप सोच रहे हैं
यह कैसी कविता...
यह तो गाना है।
इसे छोड़ो
दूसरी कविता सुनाता हूँ
माय नेम इज शीला
शीला की जवानी
आय ऍम सो सेक्सी बट तेरे हाथ न आनी।
मुझे पता है आप फिर सोच रहे है
यह कैसी कविता?
मुझे क्या हो गया है
मैं अपनी कविता क्यों नहीं सुना रहा।
मैं आप से ही पूछता हूँ
अभियाक्तियो के दमन के
इस खतरनाक दौर में
मैं आप को ओर क्या सुना सकता हूँ
अगर मैं यह पूछ लू की धरती के स्वर्ग पर
तीन महीनो में
सौ से ज्यादा जवान क्यों मार दिए गए?
अगर मैं यह पूछ लू
वह लोग जीनोने
अंग्रेजो के साथ मिल कर
हमारी पीठ पर कड़े बरसाए
वह देशप्रेम को परिभाषित क्यों कर रहे हैं ?
अगर मैं दलितों, पिछडो की समर्थन में
कुछ शब्द बोल दू
तो इस बात की गारंटी कौन देगा
की मुझको भी जवानी के बीस साल
सलाखों के पीछे न गुज़ारने पडें
मुझ पर भी देशद्रोह का मुकैद्मा न चले
किसी झूठे केस में फंसा
जेल में न ठोक दिया जाये।
अभियाक्तियो के दमन के
इस खतरनाक दौर में
जब विश्व भर की सत्ताएं
हर खुलने वाले मुह में पिघला हुआ सीसा
उड़ेलने को तयार बठी है
ऐसे में
मैं आप को
और क्या सुना सकता हू।
ये वह दौर है
जब हमारा खाना, पीना
चलना, उठना, बठना, पहनना सब खतरे में है।
पता नहीं कब मेरी जवान बेटी
जींस पहन ले
या अपने किसी दोस्त के साथ
बाज़ार में काफी पीने चले जाये
और किसी जमायत या सेना का कार्यकर्ता
उस पर लात गूँसे न झड़ दे।
ये वह दौर है
जब आप अपने बेडरूम में
परिवार के साथ
बिकिनी पहने अभिनेत्री को
चार मुशटंडो के साथ
अपनी मांसल जवानी बेचते
या बदनाम होते देखे
और कुछ नहीं
हालाँकि
आप के पास इक विकल्प और भी है
यह फैसला आप को ही करना है
आप को क्या चाहीए
शीला की जवानी
बदनाम मुन्नी
या मेरी कविता........

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