Wednesday, April 11, 2012

मेरी कविता

मैंने

उतार लाया है

रोता हुआ

शायद...हँसता हुआ

नहीं, रोने के बाद

हँसता हुआ

सफेद बादलों का एक फाहा

और उसे रख दिया है अपने जख्मों पर।

जब जख्मों से रिसता हुआ लहू

फाहे में सिमिट

मेरी कलम की स्याही बनता है

तभी तो में लिख पता हूँ

दर्द भरी

शायद...प्रेम भरी

नहीं, दर्द के बाद प्रेम भरी कविता।

देखो मेरी कविता में मैं हूँ

शायद...मेरी कविता में तुम हो

नहीं, मेरी कविता में मैं नहीं सिर्फ तुम हो।

मेरी कविता के हर्फ़ चमकते हैं

यह चमक सफ़ेद बादलों के फाहे ही है

शायद...यह चमक स्याही बने मेरे खून की है

नहीं, यह चमक तुम्हारे कविता हो

मेरे पन्ने पर उतर जाने की है।

मेरी कविता का इक भी

शब्द मेरी बात नहीं मानता

वह मुढ़ जाता है

तुम्हारे मोहल्ले, गली और

तुम्हारे घर की छत पर

उनको लगता है

रातों को तुम अब भी

मुझको ढूँढने निकल जाती होगी।

मेरी कविता बदसूरत है

अशोक वाटिका में

माँ सीता की सेवा में लगी त्रिजटा की तरह

शायद...मेरी कविता सुंदर है

मेनका के सोंदर्य की तरह

नही, मेरी कविता बदसूरती के बाद सुंदर है

भगवान श्री कृषण को दूध पिलाती पूतना की तरह।

मेरी कविया श्रापित है

अर्जुन के वृह्न्ल्ला बनने की तरह

शायद...मेरी कविता वरदानित है

माँ दुर्गा के हाथों मारे रक्त बीज की तरह

नहीं, मेरी कविता श्रापित हो वरदानित है

गौतम की आहिल्या की तरह।

मेरी कविता इकरंगी है

शायद...मेरी कविता बहुरंगी है

नहीं, मेरी कविता इकरंगी के बाद बहुरंगी है

जब मेरी कविता बहुरंगी बनती है

तो उस रिक्त स्थान पर

जिधर से मैं

बादलो का फाहा उतार लाया था

इक इन्द्रधनुष सा चमक जाता है।

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