
मैं एक नहीं सहस्रों डंक सह लेता
अगर तुम परशुराम होते,
मैं अंगुलियां काटना छोड़ भिक्षु बन जाता
गर तुम तथागत होते,
तुम बनते विष्णु गुप्त
मैं तुम्हारा दास होता,
मैं दुनिया वार देता
अगर तुम अरस्तु होते।
लेकिन तुमने तो ऐसा कुछ भी नहीं किया।तुमने सिखाया द्रौपदी चीरहरण में नपुंसक बनना
चौसर के खेल में पांसों की धोखाधड़ी
जरूरत आन पड़े तो अंगूठे जमा करना
ऐसे चक्र वहू रचना ताकि निहत्था अभिमन्यु फांसा जा सके
अब क्यों हो परेशान
जब जीवन के कुरुक्षेत्र मैं
मैं खड़ा हूँ
तुम्हारे सामने
गांडीव लिए...
आखिर द्रौण का सामना
तो
अर्जुन को ही करना है.
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